विटामिन बी12 की जांच पीएचसी में बंद: उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं हुईं प्रभावित

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देहरादून। उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार के दावों और धरातल की सच्चाई के बीच एक बड़ी खाई नजर आने लगी है। सूबे के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाली जनता के लिए स्वास्थ्य का आधार स्तंभ माने जाने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में अब 'मुफ्त जांच' की सुविधा पर कैंची चल गई है। सरकार ने सबसे महत्वपूर्ण मानी जाने वाली विटामिन बी-12 (B12) और विटामिन डी-3 (D3) की निःशुल्क जांचों को इन केंद्रों पर बंद कर दिया है। इस फैसले ने उन हजारों मरीजों की चिंता बढ़ा दी है, जो अपनी छोटी-छोटी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए स्थानीय स्तर पर इन केंद्रों पर निर्भर थे।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 12 अगस्त 2021 को प्रदेश की जनता को बड़ी राहत देते हुए निःशुल्क स्वास्थ्य जांच योजना का शुभारंभ किया था। शुरुआती चरण में 208 जांचों से शुरू हुई यह योजना विस्तार पाकर 266 जांचों तक पहुँच गई थी। एनएचएम के जरिए चंदन हेल्थकेयर के साथ पीपीपी मोड पर संचालित इस योजना का उद्देश्य था कि गरीब मरीज को जिला अस्पताल तक न दौड़ना पड़े। लेकिन अब, जब 31 मई को संबंधित कंपनी का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है, उससे पहले ही पीएचसी और सीएचसी स्तर पर महत्वपूर्ण जांचों को रोक दिया गया है। वर्तमान में खान-पान और लाइफस्टाइल के कारण हर दूसरे व्यक्ति में विटामिन बी-12 और डी-3 की कमी पाई जा रही है। सीएचसी और पीएचसी पर इन जांचों के बंद होने से अब मरीजों के पास केवल दो ही विकल्प बचे हैं। या तो वे लंबी दूरी तय कर जिला अस्पताल या उप जिला अस्पताल जाएं, जहाँ भारी भीड़ का सामना करना पड़ता है, या फिर मजबूरी में निजी पैथोलॉजी लैब का रुख करें। प्राइवेट लैब में इन जांचों की कीमत 700 से 1500 रुपये के बीच है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो गरीब मरीज 50 रुपये की दवा के लिए सरकारी अस्पताल आता है, वह 1500 रुपये की जांच का खर्च कैसे उठाएगा? चिकित्सकों के अनुसार, इन दोनों विटामिन की कमी शरीर को खोखला कर सकती है। विटामिन बी-12 की कमी: इससे शरीर में थकान, कमजोरी, हाथों-पैरों में झनझनाहट, याददाश्त कमजोर होना और मुंह में छाले जैसी समस्याएं होती हैं। इसकी कमी से हड्डियों और जोड़ों में लगातार दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, डिप्रेशन, बाल झड़ना और बार-बार बीमार पड़ने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। डॉ. रवींद्र राणा बताते हैं कि आजकल इनएक्टिव लाइफस्टाइल के कारण मरीजों में इनकी भारी कमी है। इसकी पुष्टि केवल ब्लड टेस्ट से ही संभव है, जिसके बाद ही इलाज शुरू होता है। ऐसे में जांच बंद होना मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ जैसा है। जब इस गंभीर विषय पर स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल से सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे व्यवस्थागत सुधार का हिस्सा बताया। उन्होंने कहा, "जब व्यवस्थाएं गड़बड़ाती हैं, तो उन्हें सुधारा जाता है। हम इन व्यवस्थाओं को बेहतर करने पर काम कर रहे हैं।" वहीं, एनएचएम निदेशक डॉ. रश्मि पंत का कहना है कि विभाग अब मॉनिटरिंग और 'हेल्थ मैनेजमेंट इन्फोर्मेशन सिस्टम' को मजबूत कर रहा है ताकि भविष्य में किसी को निजी लैब न जाना पड़े। उत्तराखंड के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में पीएचसी-सीएचसी ही इलाज का एकमात्र सहारा हैं। ऐसे में महत्वपूर्ण जांचों को बंद करना न केवल सरकार की 'मुफ्त स्वास्थ्य' की छवि को धक्का पहुँचा रहा है, बल्कि गरीब जनता की जेब पर भी डाका डाल रहा है। अब देखना यह होगा कि 31 मई के बाद जब नई व्यवस्था लागू होगी, तो क्या ये जांचें दोबारा सुलभ हो पाएंगी या गरीब मरीज ऐसे ही पिसता रहेगा।