देहरादून से बाहर पहली कैबिनेट बैठक: चंपावत के बनबसा में जुटी धामी सरकार, सीमांत विकास पर फोकस

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चंपावत। उत्तराखंड की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में शनिवार को एक नया अध्याय लिखा गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिमंडल की महत्वपूर्ण बैठक देहरादून के पारंपरिक सचिवालय हॉल में न होकर, प्रदेश के अंतिम छोर पर स्थित चंपावत जिले के बनबसा (एनएचपीसी परिसर) में आयोजित हुई। यह केवल किसी स्थल का बदलाव नहीं है, बल्कि 'सचिवालय से सीमांत तक' शासन व्यवस्था को जनता के करीब ले जाने का एक दूरदर्शी और मजबूत राजनीतिक संदेश भी है।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से बाहर शासन की गतिविधियों को ले जाने की दिशा में धामी सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में शनिवार को पहली बार चंपावत जिले में मंत्रिमंडल की बैठक आयोजित की गई। बनबसा स्थित एनएचपीसी परिसर में सुबह 11 बजे से हुई बैठक को लेकर स्थानीय लोगों में खासा उत्साह दिखाई दिया। कैबिनेट मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के बनबसा पहुंचने के साथ ही जिले में सरकार की इस पहल को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं। इस बैठक की खासियत यह रही कि पहली बार राज्य मंत्रिमंडल की बैठक देहरादून से बाहर चंपावत जिले में हुई। मुख्यमंत्री धामी की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रदेश से जुड़े विभिन्न विषयों और प्रस्तावों पर चर्चा की गई। कैबिनेट बैठक से पहले तीन अक्टूबर को ही मंत्री और संबंधित अधिकारी बनबसा पहुंच गए थे। सरकार की ओर से बैठक को सीमांत क्षेत्र में शासन की मौजूदगी और स्थानीय विकास प्राथमिकताओं से जोड़कर देखा गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि कैबिनेट की बैठकें अब केवल देहरादून तक सीमित नहीं रहेंगी। प्रदेश के अलग-अलग जिलों में भी मंत्रिमंडल की बैठकें आयोजित की जाएंगी। उनका कहना है कि इससे स्थानीय स्तर की समस्याओं, विकास की संभावनाओं और क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को शासन के सामने सीधे रखने का अवसर मिलेगा। मुख्यमंत्री ने सीमांत क्षेत्रों को राज्य की सुरक्षा, संस्कृति और विकास की महत्वपूर्ण कड़ी बताया। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है। इसके लिए आधारभूत सुविधाओं, रोजगार, पर्यटन और कनेक्टिविटी को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा।धामी ने कहा कि शासन को जनता के और करीब ले जाना सरकार की प्राथमिकता है। जब मंत्रिमंडल की बैठकें अलग-अलग क्षेत्रों में होंगी तो स्थानीय परिस्थितियों और जन अपेक्षाओं को समझने में मदद मिलेगी। इससे विकास की जरूरतों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी स्थानीय संदर्भ मिल सकेगा। चंपावत में कैबिनेट बैठक को लेकर स्थानीय लोगों में उत्साह देखा गया। कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा ने कहा कि सीमांत जिलों और बॉर्डर क्षेत्रों पर सरकार का विशेष फोकस है। उन्होंने कहा कि पर्वतीय जिलों के विकास को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से चंपावत में कैबिनेट बैठक आयोजित करना महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, इससे स्थानीय लोगों तक यह संदेश जाएगा कि सरकार सीमांत क्षेत्रों की समस्याओं और विकास की जरूरतों के प्रति गंभीर है। कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने भी बनबसा में हुई बैठक को लेकर स्थानीय उत्साह का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सरकार के लोगों के बीच पहुंचने से स्थानीय स्तर पर यह भावना मजबूत हुई है कि शासन उनकी बात सुनने के लिए उनके बीच आया है। चंपावत जैसे सीमांत जिले में मंत्रिमंडल की बैठक होने का महत्व केवल बैठक स्थल बदलने तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड में पर्वतीय और सीमांत क्षेत्रों के सामने सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पर्यटन और कनेक्टिविटी जैसी कई चुनौतियां हैं। ऐसे में सरकार की कैबिनेट बैठक को इन क्षेत्रों की प्राथमिकताओं से जोड़कर देखना स्वाभाविक है। सरकार का कहना है कि सीमांत गांवों से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक संतुलित विकास उसकी प्राथमिकता है। स्थानीय परिस्थितियों के बीच मंत्रिमंडल की बैठक आयोजित करने से शासन और जनता के बीच संवाद का एक अलग मंच तैयार हो सकता है। अक्टूबर की यह पहली कैबिनेट बैठक होने के साथ ही आगामी विधानसभा सत्र से पहले सरकार के लिए भी यह बैठक महत्वपूर्ण रही। अब इस पहल की असली कसौटी यह होगी कि अलग-अलग जिलों में कैबिनेट बैठकें आयोजित करने के साथ स्थानीय समस्याओं और प्रस्तावों पर लिए गए फैसलों का धरातल पर कितना असर दिखाई देता है। चंपावत से शुरू हुई यह पहल यदि नियमित रूप से आगे बढ़ती है तो देहरादून-केंद्रित शासन व्यवस्था के साथ जिलों की स्थानीय प्राथमिकताओं को सीधे जोड़ने का एक नया माध्यम बन सकती है।