सरकारी एप के लिए निजी डेटा खर्च का विरोध, शिक्षकों ने जनगणना कार्य के बहिष्कार का लिया निर्णय

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देहरादून। उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में एक बार फिर बड़े टकराव के संकेत मिल रहे हैं। अपनी लंबित मांगों को लेकर लंबे समय से संघर्षरत 'जूनियर हाई स्कूल शिक्षक संगठन उत्तराखंड' ने अब सरकार के खिलाफ सीधे युद्ध का बिगुल फूंक दिया है। संगठन ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि उनकी मूलभूत समस्याओं का तत्काल समाधान नहीं हुआ, तो वर्ष 2026-27 में प्रस्तावित राष्ट्रीय जनगणना कार्य का पूर्ण बहिष्कार किया जाएगा। शिक्षक संगठन की नाराजगी का एक बड़ा कारण जनगणना कार्य के लिए शिक्षकों पर बनाया जा रहा तकनीकी दबाव है। संगठन के प्रदेश महामंत्री जगबीर सिंह खरोला और अध्यक्ष विनोद थापा ने संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि जनगणना के लिए शिक्षकों को मोबाइल ऐप डाउनलोड करने को मजबूर किया जा रहा है। इसके लिए उच्च क्षमता वाले स्मार्टफोन की जरूरत है। शिक्षकों का कहना है कि वे सरकारी काम के लिए अपने निजी मोबाइल, सिम और व्यक्तिगत डेटा का उपयोग हरपिंज नहीं करेंगे। उन्होंने मांग की है कि यदि सरकार जनगणना का काम करवाना चाहती है, तो शिक्षकों को सरकारी मोबाइल फोन और डेटा उपलब्ध कराया जाए।

शिक्षक नेताओं ने सरकार की दोहरी नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बिना टीईटी (TET) उत्तीर्ण शिक्षकों को शिक्षण कार्य के लिए अयोग्य माना जाता है, तो फिर डिजिटल जनगणना जैसे जटिल तकनीकी कार्य के लिए उन्हें योग्य कैसे मान लिया जाता है? संगठन की मांग है कि वर्ष 2011 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से मुक्त किया जाए। इसके अलावा, अनिवार्य तीसरी पदोन्नति का मार्ग खोलने और त्रिस्तरीय शिक्षा व्यवस्था को लागू करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई है। शिक्षकों ने वेतनमान 17140 से प्रभावित साथियों की रिकवरी रोकने और पुरानी पेंशन योजना (OPS) को बहाल करने की मांग दोहराई है। स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर बने 'गोल्डन कार्ड' को लेकर भी शिक्षकों में भारी गुस्सा है। उनका कहना है कि हर महीने वेतन से कटौती तो हो रही है, लेकिन अस्पतालों में निशुल्क इलाज की सुविधा नहीं मिल रही। संगठन ने मांग की है कि सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में शिक्षकों को वास्तविक रूप से कैशलेस इलाज की सुविधा दी जाए। संगठन ने जूनियर हाई स्कूलों में पूर्व की भांति अंग्रेजी शिक्षक और प्रधानाध्यापक सहित पांच पदों के सृजन की मांग की है। साथ ही रिक्त पदों के सापेक्ष शीघ्र पदोन्नति की प्रक्रिया पूरी करने पर जोर दिया है। शिक्षक नेताओं ने साफ किया कि अब वे केवल आश्वासनों से मानने वाले नहीं हैं। जनगणना जैसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कार्य में शिक्षकों की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान होती है। यदि सरकार और शिक्षक संगठन के बीच यह गतिरोध समाप्त नहीं हुआ, तो आने वाले समय में न केवल जनगणना का कार्य प्रभावित होगा, बल्कि प्रदेश की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। अब सबकी नजरें शासन की ओर हैं कि वह इस 'मोर्चाबंदी' को कैसे शांत करती है।