नई दिल्ली। नेपाल के उत्तरी पहाड़ी इलाकों में बुधवार को आई विनाशकारी आपदा ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। शुरुआती तौर पर इसे बाढ़ और भूस्खलन की घटना माना गया, लेकिन सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के विश्लेषण से संकेत मिल रहे हैं कि इस तबाही की शुरुआत एक विशाल ग्लेशियर-जनित हिमस्खलन से हुई। कुछ ही मिनटों में बर्फ, चट्टान, पानी और मलबे ने नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र से लेकर त्रिशुली और नारायणी नदी की घाटियों तक भारी तबाही मचा दी। काठमांडू से करीब 45 किलोमीटर उत्तर में स्थित 7,234 मीटर ऊंचे लांगटांग लिरुंग पर्वत के उत्तरी हिस्से से ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटने की बात सामने आई है। अनुमान के मुताबिक करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई से लगभग 2 हजार फीट चौड़ा बर्फ का हिस्सा टूटकर करीब 4 हजार फीट नीचे घाटी में गिरा। इतनी ऊंचाई से बर्फ और चट्टानों के गिरने से पैदा हुई ऊर्जा ने पूरे इलाके को हिला दिया और इसके बाद पानी, मिट्टी, पत्थरों तथा बर्फ का विशाल मलबा नीचे की ओर तेजी से बढ़ा। खबरों के मुताबिक, यह मलबा प्रवाह कई जगहों पर करीब 100 फीट ऊंची लहर जैसा दिखाई दिया। पहाड़ों की संकरी और खड़ी घाटियों ने इसकी रफ्तार को और बढ़ा दिया। देखते ही देखते यह मलबा त्रिशुली नदी में जा मिला और नदी का प्रवाह विनाशकारी रूप लेता चला गया। इस आपदा के बीच भूकंपीय गतिविधि ने वैज्ञानिकों के सामने एक नई पहेली खड़ी कर दी है। उसी सुबह चीन सीमा के पास नेपाल समय के अनुसार करीब 8:37 बजे 4.4 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। अब वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस भूकंप ने पहले से कमजोर हो चुकी बर्फ और चट्टानों को खिसकने के लिए मजबूर किया या फिर ग्लेशियर और मलबे के विशालकाय टूटने से ही स्थानीय स्तर पर भूकंपीय कंपन पैदा हुआ। अगर भूकंप ट्रिगर साबित होता है तो यह घटना हिमालयी इलाकों में प्राकृतिक खतरों की जटिलता को एक बार फिर सामने लाती है। वहीं, यदि ग्लेशियर का टूटना स्वतंत्र रूप से हुआ, तो यह जलवायु परिवर्तन और तेजी से कमजोर हो रहे हिमालयी ग्लेशियरों को लेकर गंभीर चेतावनी होगी। गुरुवार सुबह तक आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या 160 से अधिक पहुंचने की बात सामने आई है। हालांकि, आपदा का व्यापक क्षेत्र और कई इलाकों में संपर्क टूटने के कारण मृतकों का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। रातभर नारायणी नदी में भी शवों, पशुओं और मलबे के बहने की खबरों ने त्रासदी की भयावहता को और बढ़ा दिया। रेस्क्यू एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन इलाकों तक पहुंचने की है जहां सड़कें और पुल बह गए हैं। कई गांवों का संपर्क टूट गया है और संचार व्यवस्था भी प्रभावित हुई है।
सीमा के करीब बना मलबे का बांध, फिर टूटी झील
आपदा का एक और खतरनाक पहलू नेपाल-चीन सीमा के आसपास सामने आया। ग्लेशियर और चट्टानों का मलबा ल्हेन्दे खोला नदी के प्रवाह में पहुंच गया और नदी का रास्ता कुछ समय के लिए बाधित हो गया। इससे पानी जमा होकर झील जैसी स्थिति बनी। बाद में जब यह प्राकृतिक अवरोध टूटा तो पानी और मलबे की भारी मात्रा तेजी से नीचे की ओर बढ़ी। सीमा क्षेत्र से निकला यह मलबा कुछ ही समय में नेपाल की ओर बहने वाली नदियों में पहुंच गया। इससे त्रिशुली नदी की धारा बेहद उग्र हो गई और उसके रास्ते में आने वाले गांवों, सड़कों, पुलों और ऊर्जा परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा।
2015 की त्रासदी की याद फिर ताजा, हिमालय में बढ़ रही 'हिमालयी सुनामी'
लांगटांग लिरुंग क्षेत्र का नाम नेपाल के लिए नया नहीं है। अप्रैल 2015 में आए 7.8 तीव्रता के विनाशकारी भूकंप के दौरान इसी पर्वत के दक्षिणी हिस्से में बड़ा हिमस्खलन हुआ था। बर्फ और मलबे की विशाल मात्रा नीचे स्थित लांगटांग गांव तक पहुंची थी। उस हादसे में कम से कम 300 लोगों की मौत हुई थी। इस बार घटना पर्वत के उत्तरी हिस्से से जुड़ी बताई जा रही है, लेकिन दोनों घटनाएं इस क्षेत्र की भौगोलिक और भूगर्भीय संवेदनशीलता को रेखांकित करती हैं। विशेषज्ञ इस घटना को हिमालय में बढ़ती 'हिमालयी सुनामी' जैसी आपदाओं की कड़ी के रूप में देख रहे हैं। हाल के वर्षों में चमोली, मेलामची, सिक्किम, थामे और भोटे कोसी में भी ग्लेशियर, झील, भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ से बड़े पैमाने पर तबाही हुई है। पिछले साल 8 जुलाई को भोटे कोसी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ में 18 लोगों की मौत हुई थी। उस आपदा में नेपाल-चीन सीमा का महत्वपूर्ण व्यापार और पर्यटन चेकपॉइंट प्रभावित हुआ था। हाईवे, जलविद्युत परियोजनाएं और ट्रांसमिशन लाइनें भी क्षतिग्रस्त हुई थीं। वैज्ञानिकों ने उस घटना के पीछे सुप्राग्लेशियल झीलों के बढ़ने और उनके फटने को प्रमुख कारण बताया था। इस बार स्थिति इसलिए और गंभीर रही क्योंकि आपदा का स्रोत सीमा के बेहद करीब था। इसके चलते मलबे और पानी को नीचे की बस्तियों तथा बुनियादी ढांचे तक पहुंचने में बहुत कम समय लगा।

